Tuesday, November 19, 2019

PMC बैंक खाताधारक नहीं भूलेंगे कभी यह विश्वासघात।

PMC Bank यानी (Punjan And Maharashtra Co-operative Bank Ltd) घोटाला। जिसके शिकार हुए तमाम निर्दोष लोग, कुछ की इस घोटाले के चलते जानें भी चलीं गयीं। लोग सरकार से गुहार लगाते रहे, प्रदर्शन करते रहे लेक़िन किसी ने इन लोगों की गुहार अभी तक नहीं सुनी है। आपको बता दें जो भी आप आगे पढ़ने जा रहे हैं, वह हमारी अपनी निजी प्रतिक्रिया है, नाहीं हम कोई अर्थशास्त्री हैं और नाहीं हमारे पास किसी प्रकार के सरकारी आंकड़े। 


हम सिर्फ़ उन लोगों का दर्द आपको और देश की सरकार को महसूस कराना चाहते हैं, जो अपने ही पैसों पर अपना हक़ खोने के बाद आज सड़कों पर, पिछले दो महीनों से हैं और इसी घोटाले के चलते कुछ लोगों ने दीपावली आने के कुछ ही दिन पहले, अपने सगे परिजनों को हमेशा के लिए खो दिया!!! महाराष्ट्र के इस बैंक घोटाले के चलते सिर्फ़ आम लोग ही शिकार नहीं हुए, बल्कि जिस महाराष्ट्र में मुंबई शहर भी है, जिसे आप सपनों की नगरी भी कहते हो और जहां आपके चहेते अभिनेता और अभिनेत्रियां भी रहती हैं, उनमे से भी कुछ लोग इस घोटाले के कारण दिक़्क़त में आ गए! (नोट: PMC Bank घोटाले से सोलह लाख खाताधारक हताहत हुए हैं और अब तक इस घोटाले से आहत होकर ग्यारह लोगों की जानें जा चुकी हैं। Report: ANI News)

इस मामले को चलते हुए जैसा हमने आपको बताया कि लगभग दो महीने हो चुके हैं, आज भी PMC Bank खाताधारकों ने विरोध प्रदर्शन किया और सरकार से मांग की अपने पैसों को निकालने की! जिसपर सरकार व उनके नेता अपनी - अपनी तरह से आश्वाशन और प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लेक़िन आश्वाशन और प्रतिक्रिया देने से महाराष्ट्र के पीड़ित खाताधारकों की समस्या हल नहीं हो सकती, यह बात देश के आम लोग तो समझ रहे हैं लेकिन वो नेता नहीं जो आश्वासन और प्रतिक्रिया दे रहे हैं।


आज असल में खाताधारकों ने इसलिए विरोध प्रदर्शन किया, क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी उस याचिका को मानने से इंकार कर दिया, जिसमें याचिका कर्तायों ने मांग की थी, कि हमें हमारे लॉकर को खोलने की इजाज़त दी जाए। जिसपर बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरबीआई के काम में हस्तक्षेप करने से साफ़ मना कर दिया। जिस पर पहले से ही परेशान और मायूस खाताधारकों की हिम्मत टूट गई और वह सड़कों पर बॉम्बे हाईकोर्ट, आरबीआई और पीएमसी बैंक के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करने लगे।


आपको यह मुख्य बात भी बताना ज़रूरी है कि  जिस वक़्त यह PMC बैंक घोटाला हुआ, उस वक़्त केंद्र सरकार जिसकी ज़िम्मेदारी है पूरे देश के लोगों की दिक्कतें सुनना और उन दिक़्क़तों को हल करना, वह उस वक़्त से लेकर आज भी महाराष्ट्र में अपनी जगह बनाने यानी अपने भाजपा मंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) को मुख्यमंत्री बनाने के काम में लगी हुई है। क्योंकि भाजपा और शिवसेना में आपस में ठन गई है अपने मंत्री को मुख्यमंत्री बनने की बात को लेकर। यानी केंद्र सरकार PMC Bank घोटाले से पहले लगी हुई थी चुनाव प्रचार में और अब जीतने के बाद लगी हुई है मुख्यमंत्री का चयन करने में, जिसके बीच में फंसा हुआ है PMC बैंक का निर्दोष खाताधारक!!!

फ़िलहाल खाताधारकों को उनका पैसा और उनका हक़ मिले या ना मिले। लेक़िन खाताधारकों को समय - समय पर केंद्र सरकार की ओर से  "Nirmala Sitharaman" जी वही एक "आश्वासन" देती रहेंगी जिसकी मैंने आपसे ऊपर बात की। बाक़ी न्यूज़ चैनलों के पास राम मंदिर और हिन्दू - मुसलमान से ही फुरसत नहीं है, इसलिए हमारे और आपके पास सिर्फ़ एक ही विकल्प है, कि हम या तो पूरी तरह देश के सभी लोग सरकार का बॉयकॉट करें या फ़िर अपने ईश्वर से प्राथना।

Monday, November 18, 2019

JNU Students और Delhi Police

New Delhi, India: JNU Students के विरोध प्रदर्शन के चलते दिल्ली की सड़कों पर गाड़ियों की गति थम गई है यानी जाम की स्थिति बनी हुई है। छात्र मुख्यता जिस जगह अपना प्रदर्शन कर रहे हैं, उसे सफदरजंग टॉम्ब मार्ग कहा जाता है। 


इंडियन एक्सप्रेस न्यूज़ के अनुसार पुलिस ने यहीं, JNU छात्रों पर लाठीचार्ज किया। जिसके चलते ट्विटर पर लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया केंद्र सरकार, JNU के वाईस चांसलर और दिल्ली पुलिस के लिए देखी जा रही है।

छात्र सड़कों पर डटे हुए हैं और साथ ही अपनी शिक्षा की सुरक्षा हेतु व अपने भविष्य हेतु सड़कों पर लोगों को रोक - रोककर उनसे आग्रह कर रहे हैं, कि उनकी आवाज़ को बुलंद बनाये रखने में उनका साथ दें। उन्होंने लोगों से यह भी कहा कि यह सब सिर्फ़ हम अपने भविष्य के लिए नहीं, बल्कि देश के ग़रीब युवाओं और उनके परिवारों के लिए कर रहे हैं। इसलिए जैसे भी हो सके हमारे इस प्रदर्शन को सार्धक बनाने में हमारी मदद करें। चाहे तो इसके लिए अपने सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल कर सकते हैं!

वहीं दूसरी ओर कुछ न्यूज़ चैनलों पर और सोशल मीडिया पर कुछ दिनों से JNU के छात्रों की छवि को ख़राब करने की कोशिश की जा रही है। कुछ न्यूज़ चैनल की डिबेट्स में छात्रों को "छात्र" कहकर संबोधित नहीं किया जा रहा, बल्कि उनको एक अजीब नाम से संबोधित किया जा रहा है। नाम कुछ इस तरह से है "Tukde - Tukde Gang". साथ ही छात्रों पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि वह अपनी फ़ीस की आड़ में, अपनी व विपक्षी दलों की राजनीति चमका रहे हैं!!!


एक ट्विटर यूजर ने दिल्ली पुलिस द्वारा लाठीचार्ज में बुरी तरह घायल हुए छात्रों की तस्वीरों को अपने ट्विटर हैंडल से पोस्ट किया। साथ ही इसकी कड़ी आलोचना भी की। तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है, कि कितनी बर्बरता से दिल्ली पुलिस ने छात्रों की जायज़ मांगों को कुचलने की कोशिश की है। देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्रों के साथ हो रहे इस अत्याचार पर ज़्यादातर न्यूज़ चैनलों ने चुप्पी साथ ली है।

कुछ न्यूज़ चैनल सिर्फ़  सड़कों पर लगे जाम की बात कर रहे हैं। इसी के चलते एक चैनल के रिपोर्टर ने जब प्रदर्शन में शामिल एक छात्र से पूछा, कि आपको नहीं लगता आपके प्रदर्शन के चलते सड़कों पर जाम लग रहा है? उसपर छात्र ने जो जवाब दिया, उसपर वह रिपोर्टर पानी - पानी हो गई। जवाब ये था, कि "आपको एक दिन का जाम नज़र आ रहा है, लेक़िन हमारा और देश के ग़रीब छात्रों का दर्द नज़र नहीं आ रहा, हमारा भविष्य नज़र नहीं आ रहा? हम मानते हैं कि जाम लग रहा है हमारे विरोध प्रदर्शन के कारण, लेक़िन आप लोग उस वक़त क्यों चुप थे और हमारे ऊपर  ही तोहमत क्यों लगा रहे थे, जब हम JNU के अंदर ही वाईस चांसलर से मिलना चाहते थे बढ़ी हुई फ़ीस की बात को लेकर। हम आज यहां, जो सड़कों पर हैं उसके ज़िम्मेदार आप लोग और JNU के VC हैं जो हमसे नहीं मिले! हम कहां से देंगे इनती बढ़ी हुई फ़ीस??? क्या ग़रीबों को पढ़ने का अधिकार नहीं ? हम जायज़ बात के लिए आज सड़कों पर खड़े हैं सुबह से जिसके चलते सिर्फ़ एक सड़क पर जाम लग रहा है, जिसपर आप हमें नसीहत दे रहे हो। लेक़िन जब चुनाव के वक़्त नेताओं की रैलियां निकलती हैं और पूरे शहर को लगभग बंद सा कर दिया जाता है, तो आपके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता!!!"

JNU Students पहुंचे पार्लियामेंट का घेराव करने!

Delhi: JNU Students पिछले कई हफ्तों से अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं बेहिसाब बढ़ी हुई फ़ीस के चलते। जिसकी वज़ह से वह JNU (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) के "Vice Chancellor" मिलकर उनसे बात करना चाहते थे, लेक़िन वाईस चांसलर उनसे नहीं मिले। जिस वज़ह से उन्होंने अपना विरोध जताया और उनकी परेशानियां विरोध के रूप में सड़क पर आ गयीं। लेक़िन फ़िर भी वाईस चांसलर उनसे नहीं मिले। 


आपको बता दें, कि किसी बात का विरोध करना भारत में असंवेधानिक नहीं है, छात्र अपना विरोध कर सकते हैं। इसके बावजूद पुलिस ने दिल्ली में चल रहे छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन के दौरान पिछले दिनों, छात्रों पर लाठीचार्ज भी किया! आपको साथ में यह भी बता दें कि पुलिस के लाठीचार्ज में सिर्फ़ युवक ही नहीं, युवतियां भी पुलिस की तरफ़ से हुई लाठीचार्ज का शिकार हुयीं थीं। (आज भी एक छात्र के अनुसार छात्रों से पुलिस ने मार पीट की।)

छात्रों का यह भी आरोप है, कि मीडिया (भारत के ज़्यादातर न्यूज़ चैनल्स)  उनके साथ पक्षपात कर रही है। उनको सोशल मीडिया के माध्य्म से भी अपमानित किया जा रहा है! एक छात्र ने पिछले दिनों कहा, कि "हम अपनी जायज़ मांगों के लिए लड़ रहे हैं और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, लेक़िन वाईस चांसलर हमसे मिल नहीं रहे। पुलिस हमें मार रही है और मीडिया हमारे ही ख़िलाफ़ एक राजनीतिक अभियान छेड़े हुई है! कोई नेता या कोई भी ज़िम्मेदार व्यक्ति हमसे उस विषय में हमसे मिलने नहीं आया। हम ग़रीब हैं क्या यही हमारा गुनाह है।"

इस सबके बीच आज JNU छात्रों का प्रदर्शन दल पार्लियामेंट का घेराव करने के लिए, दोपहर करीब 3 बजे से बैठा हुआ है। दिल्ली पुलिस ने इसके चलते अपने पुख़्ता इंतेज़ाम कर लिए हैं, ताक़ि छात्र किसी भी रूप से पार्लियामेंट परिसर व अन्य किसी संवेदनशील जगह पर प्रवेश ना कर सकें। इधर नेता भी सभी दलों के अपनी - अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। ट्विटर पर भी अलग - अलग नाम से हैशटैग छात्रों के विरोध के चलते चलाए जा रहे हैं।

(आज भारत की राजधानी यानी दिल्ली में "Microsoft के Bill Gates" भी आए हुए हैं। आज उन्होंने भाजपा की नेता स्मृति ईरानी से भी मुलाकात की।)

आपको आख़िर में यह भी बता दें, कि दिल्ली प्रदूषण के मामले में अपनी सभी हदे पार कर चुकी है और दिल्ली के सभी डॉक्टरों ने सलाह दी है, कि ज़रूरी काम से ही घर के बाहर निकले अन्यथा नहीं। इस प्रदूषण को देखते हुए भी JNU के छात्र प्रदर्शन करने को मजबूर हैं, उसके बावजूद भी नेता और उनके समर्थक, छात्रों की दिक्कतें सुनने को तैयार नहीं!

Sunday, November 17, 2019

Ayodhya फैंसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा AIMPLB (All India Muslim Personal Law Board)

आज उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में AIMPLB (All India Muslim Personal Law Board) की मीटिंग हुई, जिसकी अध्यक्षता बोर्ड के राष्ट्रियाध्यक्ष अरशद मदनी (Arshad Madni) ने की। यह मीटिंग अयोध्या से जुड़े फैंसले पर की गई थी, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 09 नवंबर 2019 को फैंसला राम मंदिर के पक्ष में दिया था और दूसरे पक्ष (मुस्लिम समुदाय) को अयोध्या में ही कहीं उपयुक्त स्थान पर पांच एकड़ ज़मीन देने का फैंसला सुनाया था। 

लेक़िन फैंसले वाले दिन ही सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वक़ील Zafaryab Jilani ने अपनी असंतुष्टि ज़ाहिर कर दी थी, साथ ही Asaduddin Owasi साब ने भी एक बयान में यह कहा था कि न्यायालय की ओर से दी जाने वाली पांच एकड़ ज़मीन हमें नहीं चाहिए (यह इन दोनों लोगों के अपनी निजी बयान थे।) जिसपर बाद में न्यूज़ चैनलों पर काफ़ी डिबेट्स भी हुयीं और अलग - अलग तरह से इन बयानों के कयास भारत में भारत के नेता और लोग लगाने लगे। कुछ लोग भारत में इन दोनों के बयानों पर सहमत थे, तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इनके बयानों से सहमत नहीं थे। (सहमति व असहमति में देश के सभी समुदाय के लोग थे।) 

आज उसी फैंसले को लेकर एक मीटिंग AIMPLB के सदस्यों ने की, जिसमें राष्ट्रियाध्यक्ष अरशद मदनी ने कहा कि हम न्यायालय में एक पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल करेंगे। ताक़ि इस मामले में न्यायालय एक बार और हमारी प्रार्थना के तहत फैंसले पर विचार करे। साथ ही बैठक में यह भी साफ़ कहा कि जो ज़मीन हमें  दी जा रही है, उसे हम अपनी मस्जिद (बाबरी मस्जिद) के बदले नहीं ले सकते। क्योंकि यह हमारे धर्म के ख़िलाफ़ है यानी शरिया कानून के तहत। 


Zafaryab Jilani साब ने भी मीटिंग के बाद हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात को दोहराया और कहा, कि AIMPLB न्यायालय में Review Petition दाख़िल करेगा और जो पांच एकड़ ज़मीन मुस्लिम समुदाय को दी जा रही है AIMPLB उसे भी नहीं लेना चाहता। साथ ही जफरयाब जिलानी साब ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा, कि हमें ज़मीन वहीं हमारी बाबरी मस्जिद वाली जगह पर चाहिए।

जिसके बाद यह ख़बर सभी न्यूज़ चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज़ बन गई और इसपर शुरू हो गयीं रोज़मर्रा की वही डिबेट्स। जिसमें सब अपनी अपनी बात रख रहे थे। हालांकि पुनर्विचार याचिका दाखिल करना असंवेधानिक बिल्कुल नहीं है, याचिका दाखिल की जा सकती है। क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और क़ानून के मुताबिक भी यह कोई ग़लत क़दम नहीं है।

लेक़िन इसका कितना असर देश में रह रहे लोगों के ऊपर पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी। क्योंकि फैंसले वाले दिन ही यानी 09 नवंबर 2019 को जब Jilani और Owaisi साब का बयान आया था, तो अचानक सोशल मीडिया पर लोगों की प्रितिक्रिया एक समान नहीं थी।



(12 नवंबर 2019 की पोस्ट में, मैंने Jilani और Owasi साब के बयानों का ज़िक्र किया था। जिसमें मैंने अपनी निजी टिप्पणी और उससे संबंधित अपनी राय लोगों के सामने रखी थी। अगर आप चाहें तो वह पोस्ट आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

Friday, November 15, 2019

JNU Students Protest

JNU Students Protest


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आसान शब्दों में मैंने JNU (Jawaharlal Nehru University) Students के विरोध प्रदर्शन के कारण को समझा और उसी आसान भाषा में, मैं आपको भी समझाने की कोशिश करूंगा अपने इस ब्लॉग के माध्य्म से।

JNU यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जो दिल्ली में स्तिथ है वह भारत का एक प्रसिद्धि विश्वविद्यालय है, जिसका निर्माण सन 1969 में हुआ था। यह एक सरकारी यूनिवर्सिटी है जिस तरह सरकारी स्कूल होते हैं छोटे बच्चों के लिए, जो हर शहर या गांव में होते हैं। जहां ग़रीब तबक़े यानी उन परिवारों के बच्चे शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं जिन परिवारों की आय बहुत ही न्यूनतम होती है। परिवारों की माली हालत गंभीर होने के कारण, बच्चों को मिड डे मील (Mid Day Meal) भी दिया जाता है, ताक़ि बच्चे कुपोषण का शिकार ना हो जाएं। क्योंकि कुपोषण की वज़ह से किसी भी उम्र का व्यक्ति बेहद बुरी तरह से बीमार हो सकता है, यहां तक की उसकी जान भी जा सकती है। काफ़ी सारे मामले ऐसे भी आए हैं, जिसमें मिड डे मील दूषित भी पाया गया और पर्याप्त भी नहीं पाया गया जिससे बच्चे बीमारियों का भी शिकार हुए और कमज़ोरी का भी। (आपको बता दें कि छोटे बच्चों के लिए सरकार की ओर से खोले गए यह स्कूल लगभग बिना फ़ीस के बच्चों को शिक्षा प्राप्त कराने के लिए खोले गए हैं, लेकिन इन स्कूलों में प्राप्त हुई जानकारियों के अनुसार बच्चे कोई भी शिक्षा बच्चे प्राप्त नहीं कर पाते!)

लेक़िन JNU में छात्रों को फ़ीस देनी पड़ती है और अभी हाल में ही अचानक फ़ीस में छात्रों के अनुसार बेहिसाब बढ़ोतरी कर दी गई, जिसके चलते छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया उसके विरोध में, वो सुनने में आपके भी आया होगा। जिसपर सियासी घमासान फ़िलहाल अभी न्यूज़ चैनलों पर जारी है, जिसमें किसी चैनल या न्यूज़ ऐजेंसी का कुछ कहना है तो किसी का कुछ। यानी एक न्यूज़ चैनल छात्रों के प्रदर्शन पर सिर्फ़ रिपोर्टिंग कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर, दूसरा न्यूज़ चैनल छात्र और छात्रों के विरोध प्रदर्शन को पूरी तरह ग़लत ठहरा रहा है। कुछ न्यूज़ चैनलों पर यह भी कहा जा रहा है कि छात्र दुर्व्यवहार कर रहे हैं लोगों व पुलिसकर्मियों से।

यह तो सब थी बात जो स्टूडियो में बैठकर न्यूज़ एंकरों ने कही और आपको व मुझे पता चली। लेक़िन इस पूरे विवाद में ख़ुद छात्रों का क्या कहना है उसे समझना जरूरी है। काफ़ी छात्रों को यह कहते हुए सुना गया कि उनके "परिवार की माली हालत बहोत ही कमज़ोर है और इसी वज़ह से हम, JNU की कम फ़ीस के कारण यहां पढ़ पा रहे हैं। अब अगर फ़ीस को बेहिसाब या बढ़ा दिया जाएगा तो हम क्या करेंगे? हमारे परिवार की आय इतनी नहीं कि हम JNU द्वारा बढ़ाई गई फ़ीस को भर सकें। इसी वज़ह से हम अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।" इस विरोध प्रदर्शन के चलते पुलिस ने छात्रों पर बुरी तरह लाठी चार्ज भी किया, जिसकी रिपोर्टिंग काफ़ी चैंनलों ने नहीं की।


कितनी सही है छात्रों की यह बात और उनका विरोध प्रदर्शन, आईये समझने की कोशिश करते हैं।



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असल में जो छात्र विरोध कर रहे हैं, उनके परिवार की माली हालत का आंकलन ख़ुद सरकार और यूनिवर्सिटी भी कर सकती है, जिसके काफ़ी तरीक़े हैं। लेक़िन मौजूदा सरकार इसपर चुप्पी साधे हुए है और यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर भी छात्रों से मुलाक़ात नहीं कर रहे। क्योंकि सच यह है कि यह छात्र जिन परिवारों से आते हैं उस परिवार का मुखिया या उस परिवार के कमाने वाले लोग या तो ग़रीब किसान हैं या फ़िर ऐसे लोग जो मज़दूर तबक़े के हैं। जिनकी वार्षिक आय इतनी भी नहीं कि वह सरकार को उसमें से टैक्स दे सकें, जिससे कि सरकार उस पैसे को भारत में किसी ऐसे काम में लगा सके, जिसका इस्तेमाल अमीर और ग़रीब दोनों कर पाएं।

लेक़िन क्या यह कहना ठीक होगा या इस बात का ताना मारना ठीक होगा, किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए को जो सरकार को टैक्स अपनी वार्षिक आय में से देने में समर्थ नहीं है, "कि तुम हमारे टैक्स के पैसे से नहीं पढ़ सकते या अमीर के टैक्स के पैसे पर ग़रीब का कोई हक़ नहीं?" तो इसपर मेरा एक छोटा सा सवाल है, कि फ़िर किसके लिए है टैक्स का पैसा? आप कहेंगे कि "टैक्स का पैसा सड़कों व इसी तरह की चीज़ों के इस्तेमाल के लिए है जिससे भारत निर्माण हो, किसी ग़रीब के लिए नहीं। ग़रीब हो तो हम क्या करें?"


अब यहां कुछ बातें समझने वाली है। 

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सबसे पहली बात यह कि JNU की फ़ीस इतनी कम क्यों है, यह समझिए पहले। JNU की फ़ीस इतनी कम इसलिए है क्योंकि वह एक सरकारी संस्थान/विश्वविद्यालय है और इसलिए खोला गया ताक़ि वहां ग़रीबों को शिक्षा प्राप्त हो सके। यहां ज़्यादातर तादात उन बच्चों की ज़्यादा है जिनके परिवार खेती - किसानी व दिहाड़ी मज़दूरी से अपनी जीविका चलाते हैं। इसी वज़ह से इन छात्रों के लिए JNU जैसी यूनिवर्सिटी उपयुक्त हैं शिक्षा प्राप्त करने के लिए। यह बात ठीक है कि वह या उनके परिवारजन सरकार को टैक्स नहीं दे पाते, लेक़िन यह बात उन लोगों की बिल्कुल ग़लत है जो इस बात को कह रहे हैं कि हमारे टैक्स के पैसे से आप शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते! क्योंकि सरकार इन्हें बिल्कुल फ़्री शिक्षा JNU में नहीं दे रही, उनसे फ़ीस ली जाती है!

दूसरी बात यह कि इन बच्चों के परिजनों में से कोई किसान है तो कोई दिहाड़ी मज़दूर। किसान और एक दिहाड़ी मज़दूर की कितनी अहम भूमिका होती है देश निर्माण में उसका आंकलन करना भी पाप होगा। किसान से ही पूरा देश आबाद है और कैसे है, इसपर आप ख़ुद गंभीरता से विचार करना। उसके बाद भी आज किसान की बड़ी ही दयनीय हालत है, जिसके चलते देश भर में यही किसान हर साल हजारों की संख्या में आत्महत्या करने पर मज़बूर हैं। जिसपर देश के भृष्ट नेता और न्यूज़ चैनल कुछ नहीं बोलते। यह लोग आपको अन्न देते हैं खाने के लिए और ख़ुद बदहाली के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। इन्हीं किसानों व दिहाड़ी मज़दूरों के बच्चे JNU और ऐसे ही स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। "फ़िर भी आज लोग इन बच्चों को ताना मार रहे हैं। जबकि यह बहोत शर्म की बात है!"

तीसरी बात अहँकार में डूबे हुए शायद वो टैक्स पेयर नहीं जानते, कि भले ही यह लोग टैक्स ना दे रहे हों और नाहीं इनके परिजन, अर्थिक तंगी की वज़ह से। लेक़िन उसके बदले इनके परिजन सरकार की ग़लत नीतियों के कारण देशभर में आत्महत्या कर रहे हैं। इसके साथ ही बहोत से छात्र अर्थिक रूप से कमज़ोर होने के चलते, अपनी शिक्षा बीच में छोड़ देते हैं और परिवार के भरण पोषण के लिए छोटी मोटी नौकरी कर लेते हैं। वहीं दूसरी ओर जिनके परिवार के बच्चे आर्थिक रूप से मज़बूत होते हैं, उनको किसी अच्छी कंपनी में नौकरी भी मिल जाती है और अच्छी तनख्वाह (Salary) भी। जिसका ज़िक्र ना तो सरकार करती है और नाहीं यूनिवर्सिटी का संचालक दल। कभी कोई रिपोर्ट यूनिवर्सिटी के माध्य्म से सामने नहीं आई, जिसमें लिखा हो या जिससे पता चलता हो कि आर्थिक तंगी की वज़ह से इतने छात्र यूनिवर्सिटी छोड़कर बीच में ही चले गए! जो की बहोत ही "शर्मनाक" वज़ह है समाज, सरकार और शिक्षा संस्थानों व JNU जैसे विश्वविध्लयों के लिए!

चौथी बात सबसे ज़्यादा शर्मनाक है, कि कुछ लोग बिना सोचे समझे या अपने निजी स्वार्थ के चलते इन छात्रों की सही बात होने के बावजूद इनकी आलोचना सोशल मीडिया के माध्य्म कर रहे हैं। जिसकी वज़ह से सरकार और यूनिवर्सिटी संचालकों का असली चेहरा दुनिया के सामने नहीं आ पाता। बाक़ी की कसर पूरी कर देते हैं भारत के न्यूज़ चैनल्स!!!

पांचवी बात, अब अगर यह ग़रीब छात्र JNU में या ऐसे ही भारत के किसी विश्विद्यालय में पढ़ना चाहते हैं जिनके परिजन इतनी कुर्बानी दे रहे हों देश के लोगों के लिए और उनके साथ हो रही नाइंसाफी पर उनका कोई साथ नहीं दे रहा हो, उसकी बजाए उनकी आलोचना कर रहा हो और उनका वाईस चांसलर भी उनसे ना मिल रहा हो, जिस वज़ह से उनको विरोध करना पड़ रहा हो और साथ ही बेहिसाब पीटना पड़ रहा हो पुलिस वालों से अपनी जायज़ मांगों के चलते, तो भी क्या JNU के छात्र ही ग़लत हैं?

छठी और आख़री बात यह, कि आर्थिक समस्याओं का शिकार कोई भी और कभी भी हो सकता है। इसलिए हमें कुछ भी बिना सोचे समझे नहीं कहना और करना चाहिए, जिससे किसी की पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाये। क्योंकि सबको हक़ है अच्छी शिक्षा और अच्छी ज़िन्दगी जीने का! अगर हमारा समाज पढ़ा लिखा नहीं होगा तो देश विकास कैसे करेगा। देश की हालत पहले से ही बहोत ख़राब है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता!


आपको और देश के लोगों को मूर्ख बनाते कुछ न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया के लोग। 

बढ़ी हुई फ़ीस को लेकर JNU का विरोध प्रदर्शन october 2019 से जारी है फ़िलहाल आज 15-11-2019 तक और अभी कितने समय तक यह जारी रहेगा, इसपर कुछ भी कहना मुश्किल है। लेक़िन दिनांक 13-11-2019 यानी परसों अचानक बेहद बढ़ी हुई फ़ीस के सिलसिले में एक ख़बर सामने आई। जिसमें कहा गया कि जो फैंसला बढ़ी हुई फ़ीस को लेकर लिया गया था, उस फैंसले को वापस लिया जा रहा है और फ़ीस को उतना नहीं बढ़ाया जा रहा जिससे छात्रों को दिक़्क़त हो। मगर बात समझ नहीं आ रही थी क्योंकि न्यूज़ चैनल घुमा फिरा कर न्यूज़ दे रहे थे। साथ ही बहुत ज़ोर देकर कह रहे थे कि फ़ीस में बहुत भारी कटौती कर दी गई है दुबारा।

लेक़िन धीरे - धीरे यह सारी बात उस वक़्त साफ़ हो गई, जब प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने ख़ुद अपने बयान दिए न्यूज़ चैनलों के माध्य्म से। उन्होंने बताया कि न्यूज़ चैनल्स और सोशल मीडिया पर लोग देश के लोगों को ग़ुमराह कर रहे हैं, फ़ीस में जो लंबी चौड़ी कटौती की बात देश के कुछ न्यूज़ चैनल कर रहे हैं वह सरासर ग़लत है और झूठी है। फ़ीस में भारी बढ़ोतरी की गई और बहुत ही मामूली कटौती, उसी बढ़ी हुई फ़ीस में करके दिखाया जा रहा है!!!

इसके बाद अचानक एक घटना और हुई। असल में ABVP (Akhil Bhartiya Vidhyarti Parishad) Union, जो भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करती है (ऐसा कई ख़बरों में सुना गया है) और RSS यानी संघ परिवार की सदस्य है, उसने बढ़ी हुई इस फ़ीस का विरोध किया। यह बात परसों यानी 13-11-2019 की है। जैसे ही ABVP ने विरोध प्रदर्शन किया उसकी ख़बर सभी न्यूज़ चैनलों के माध्य्म से पता चलनी शुरू हो गयी। ABVP के इस प्रदर्शन को अभी सिर्फ़ दो घंटे ही हुए थे और अचानक वो ख़बर सामने आई, जिसका ज़िक्र अभी मैंने आपसे ऊपर किया। कि भारी बढ़ी हुई फ़ीस को वापस ले लिया गया है!


अब यह क्यों हुआ इसे भी समझने की ज़रूरत है। 


दरसल अभी केंद्र सरकार यानी भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ हाथ मिलाकर चुनाव लड़ा और कांग्रेस से कड़ी टक्कर नहीं, बल्कि अपनी गलत नीतियों के चलते मुश्किल से जैसे - तैसे आख़िर जीत ही गयी। जिसका सबूत था कि जीत का कोई बड़ा हल्ला पार्टी नहीं कर पाई! लेक़िन भाजपा की जीतने के बाद भी इतनी बेइज़्ज़ती हो रही है इस दौरान, जितनी किसी पार्टी की हारने के बाद भी नहीं होती। 

क्योंकि जीतने के बाद दोनों पार्टियों में काफ़ी कहा सुनी हो गई, इस बात को लेकर कि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री किसका होगा। भाजपा कह रही है कि हमारा नेता होगा यानी Devendra Fadnavis और शिवसेना कह रही है कि हमारा होगा यानी Aditya Thackeray! इसको लेकर काफ़ी किरकिरी भाजपा की हो रही है भारत में। भाजपा को नहीं पता शायद कि कैसे Damage Control किया जाए।

अब दिल्ली में भाजपा का समर्थन करने वाली छात्र यूनियन ABVP भी विरोध प्रदर्शन कर रही है और देश की जनता की नज़रों में जाने अनजाने पार्टी की और छवि ख़राब ना हो जाये, इसलिए लगता है कि तुरंत यह फ़ीस कटौती की बात सामने आई। हालांकि फ़ीस पूरी तरह से उसी पैटर्न पर वापस नहीं ली गई है, लेक़िन लगता है अचानक पूरी तरह से फ़ीस उसी पैटर्न में लाने से JNU और केंद्र सरकार भाजपा की बात ख़राब हो सकती है। इसलिए शायद फ़ीस उसी ढर्रे पर कुछ अंतराल के बाद आ जाये।

(आख़िर में यही कहूंगा कि छात्र JNU का हो या कहीं का भी, उसके ऊपर लाठीचार्ज करना ग़लत है। छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, ग़लत बात का विरोध कर रहे थे ना की किसी को मार रहे थे। और एक बात हमेशा याद रखिएगा, कि यह लोग फ़्री में नहीं पढ़ रहे और जो क़ीमत यह छात्र और इनके परिवार चुका रहे हैं उसकी कल्पना भी करना मुश्किल है। यह बात मैं पहले भी कर चुका हूं।)

(JNU के छात्र प्रदर्शन करने सड़कों पर तब आये, जब लगातार उनके यानी छात्रों के आग्रह करने के बाद भी उनकी परेशानियों को सुनने व समझने के लिए JNU के Vice Chancellor उनसे नहीं मिले।)

(विरोध प्रदर्शन के दौरान जो नए आरोप उनके ऊपर 13-11-2019 से मढ़े जा रहे हैं कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमा के ऊपर कुछ लिख दिया है या उससे छेड़छाड़ की है और यूनिवर्सिटी परिसर में या कहीं भी। तो उसपर छात्रों ने पहले ही साफ़ तौर पर कह दिया है कि उन्होंने नारे लिखें हैं जो उनकी मांगों को दर्शाते हैं लेक़िन स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमा पर नहीं। क्योंकि आपको बता दें कि इससे पहले भी JNU के स्टूडेंट्स को एक Edited वीडियो के आधार पर बदनाम किया गया था।)

(भाजपा व देश के कुछ न्यूज़ चैनलों को पता नहीं क्यों इतनी दिक़्क़त है JNU के छात्रों से समझ नहीं आता। जबकि भाजपा को शर्मिंदगी होनी चाहिए कि जो उन्होंने दो करोड़ रोज़गार हर वर्ष देने की बात कही थी, वो तो दे नहीं पाई, उल्टा उनकी शिक्षा के पीछे पड़ी हुई है। JNU क्यों राजनीति में घसीटा जा रहा है यह तो मैं साफ़ तौर पर नहीं कह सकता, लेक़िन यह ज़रूर कह सकता हूं कि भारत में मौजूदा हालात को देखते हुए बेरोज़गार और युवाओं के लिए ज़िन्दगी की राह बेहद कठिन है!)

Tuesday, November 12, 2019

Ayodhya विवाद, ख़त्म या शुरू?

Ayodhya विवाद, ख़त्म या शुरू? 

Embed from Getty Images (क्योंकि यह एक बहुत ही संवेदनशील मामला है, इसलिए मैं अपनी "निजी" राय रखने से पहले "भारत की माननीय उच्चतम न्यायालय व सभी आदरणीय जजों" के समक्ष एक निवेदन करना चाहता हूं। कि जो भी मैं आगे अपने ब्लॉग में लिख़ने जा रहा हूं, वो सिर्फ़ मेरी अपनी निजी राय है। इसलिए अगर मुझसे किसी प्रकार की त्रुटि हो जाए तो मुझे कृप्या माफ़ करने की कृपा करें। धन्यवाद।)

इसी के साथ अब मैं अपनी बात आपके सामने रख़ता हूं। (मैं लंबी चौड़ी डिटेल में अपनी बात नहीं रखूँगा, बस जो मेरे दिल में है। उसे आपके सामने रखूँगा।)

माननीय न्यायालय ने तारीख़ 09 नवंबर 2019 को सुबह के वक़्त एक बहोत बड़ा फैंसला सुनाया। जो अयोध्या के विषय में था। उसमें विवादित जगह हिन्दू समुदाय के लोगों को दे दी गई और अयोध्या में ही कहीं और 5 एकड़ जमीन दूसरे समुदाय यानी मुसलमानों को दे दी गई। जिसपर राजनीति बड़े लंबे समय से चली आ रही थी और अब फैंसला आने के बाद भी थमती हुई नहीं दिख रही। 



असल में, जिस दिन फैंसला आया उसी दिन सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वक़ील "Zafaryab Jilani" ने पत्रकारों से एक छोटी सी भेंटवार्ता की। जिसमें उन्होंने कहा, कि हम सुप्रीम कोर्ट का और उसके हर फैंसले का सम्मान करते हैं। लेक़िन हम इस फैंसले से संतुष्ट नहीं हैं! लेक़िन "Personally" मुझे "Zafaryab Jilani"  साब की यह बात ठीक नहीं लगी। हालांकि हर आदमी को स्वतंत्रता है अपनी बात व राय रखने की, लेक़िन यहां जिलानी साब की यह बात मन में शंका पैदा करती है।

क्योंकि वे दो बातें कर रहे हैं! पहली यह, कि जिलानी साब कह रहे हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं और दूसरी यह कि वह फैंसले से नाख़ुश हैं। और यह दो अलग - अलग बातें हैं। जब आप कोर्ट का सम्मान करते हैं तो उसके फैंसले का भी सम्मान करना चाहिए और संतुष्ट भी होना चाहिए। अगर हम फैंसले से ही संतुष्ट नहीं हैं, तो हम कैसे कह सकते हैं कि हम कोर्ट का सम्मान करते हैं! यानी कि यह सिर्फ़ कहने के लिए है, कि हम कोर्ट का सम्मान करते हैं। (क्योंकि सुप्रीम कोर्ट कोई व्यक्ति विशेष नहीं है, जिसका आप सम्मान तो करते हों लेक़िन उसके किसी एक फैंसले से संतुष्ट ना हों। इसके अलावा भारत में सर्वोच्च न्यायालय का फैंसला ही अपने आप में एक पूर्ण विराम है, जिसके आगे और कुछ नहीं! इसलिए हमें न्यायालय का पूरा सम्मान करते हुए उसके फैंसले को भी मानना चाहिए।)

एक बात और भी फैंसला आने से पहले लगातार सुनी जा रही थी दोनों पक्षों (यानी हिन्दू और मुसलमानों) की ओर से कि फैंसला जो भी आए, जिसके भी पक्ष में आए, उसे सब पूरी इज़्ज़त के साथ क़बूल करेंगे। लेक़िन यहां तस्वीर कुछ और ही बनी हुई है। जिलानी साब सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड यानी मुस्लिम समुदाय के पक्ष में कोर्ट में पैरवी कर रहे थे और अगर जिलानी साब ही यह कहेंगे, कि वह संतुष्ट नहीं हैं तो मुसलमानों पर भी इसका असर ग़लत पड़ेगा!


इसके बाद एक और बयान आया "Asaduddin Owaisi" साब का। उन्होंने भी कुछ इसी तरह की बात की। उनका कहना है कि "मैं भी सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करता हूं, लेक़िन इस फैंसले में कोर्ट ने जो 5 एकड़ जमीन देने की बात की है। उसकी हमें ज़रूरत नहीं है।"



इसके बाद बयान आया, "UP Sunni Central Waqf Board" के चेयरमैन श्री "Zufar Faruqi" का। जिसमें उन्होंने कहा, कि "हम कोर्ट के फैंसले का पूरा सम्मान करते हैं और हम किसी भी प्रकार की बात इस फैंसले को लेकर कोर्ट से नहीं करेंगे। हम इस फैंसले का स्वागत करते हैं और इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, कि जो भी मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति कोर्ट के फैंसले से असंतुष्ट है या जो भी कह रहा है। वह उसकी अपनी निजी राय है, उससे हमारा कोई लेना देना नहीं।" यह बात उन्होंने Zafaryab Jilani और Asaduddin Owaisi के बयान पर कही।

उन्होंने यह बात भी कही, कि "हम ख़ुद मुस्लिम समुदाय का नेतृत्व करते हैं और हमारे लोग हमसे जुड़े हुए हैं यानी मुस्लिम समुदाय के लोग। हम सभी कोर्ट के फैंसले का सम्मान करते हैं और जो भी फैंसला आया है वह हम सब को मंज़ूर है।" Zufar Faruqi साब की इस बात से लगा, कि चलिए दोनों पक्षों के लोगों में अब इस बात को लेकर आगे भविष्य में कोई बात नहीं होगी और देश में चले आ रहे इस सदियों के विवाद से आम आदमी को हमेशा के लिए निजाद मिल गई।



मग़र अचानक अगले दिन यानी 10 नवंबर 2019 को शाम क़रीब सात बजे, उप्र सेंट्रल सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वही चेयरमैन Zufar Faruqi जिनका अभी मैंने ज़िक्र किया, वे अपने "इतने बड़े बयान से पलट गए।" और बोले कि 26 नवंबर 2019 को हम एक बैठक करेंगे, जिसमें हम विचार करेंगे कि हम कोर्ट के फैंसले पर कोई अपील या अपनी असहमति कोर्ट में दर्ज कराएं या नहीं! (असल में Zufar Faruqi का कहना है, कि उप्र सेंट्रल सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड हिंदुओं को दी जाने वाली उस जगह का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि जो 5 एकड़ की जगह मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में कहीं और दी गई है, उसे ले या ना ले इसपर वह यानी बोर्ड मेंबर बैठक में विचार करेंगे।)

इसी वज़ह से मेरे मन में शंका आयी। क्योंकि मैं तो सिर्फ़ Zafaryab Jilani साब के बयान से परेशान था, कि कितना बुरा संदेश वो अपने लोगों को दे रहे हैं। जबकि फैंसला आने से पहले सब यही कह रहे थे, कि जो भी फैंसला आए सबको मंज़ूर होगा। और यहां तो सिर्फ़ जिलानी साब ही नहीं, बल्कि ओवैसी और ज़ुफर फ़ारूक़ी भी जिलानी साब की तरह कोर्ट के फैंसले पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।

मुझे इन तीनों के बयानों में राजनीति और धर्म की दुकान चलाने वालों की साजिश नज़र आती है। क्योंकि जिलानी साब वक़ालत कर रहे थे मुस्लिम समुदाय के लिए जिनको किसी ने तो कहा होगा, कि जिलानी साब मुकदमा लड़ो हमारी बात की ख़ातिर। ओवैसी साब भी एक नेता हैं और फैंसला आने के बाद हो सकता है कि राजनीतिक गलियारे में उनकी पकड़ मुस्लिम समुदाय में कमज़ोर ना पड़ जाए, इसलिए वे इस बात को तूल दे रहे हो। और मुस्लिम समुदाय से सिर्फ़ ओवैसी ही नहीं हैं अकेले, तमाम नेता हैं जो मुस्लिम समुदाय में अपनी अच्छी पहचान रख़ते हैं और पकड़ रख़ते हैं। उन सबको कहीं न कहीं यही लग रहा होगा कि कहीं हमारे मुस्लिम समुदाय के लोग नाराज़ ना हो जाएं और हमें भविष्य में कोई दिक़्क़त ना हो जाए, चुनाव के वक़्त!

अब आख़िर में रही बात Zufar Faruqi साब की  जो उप्र सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के चैयरमैन हैं, उनका अचानक अपने बयान से पलटना साफ़ ज़ाहिर करता है कि मुस्लिम धर्म के नाम पर राजनीति और अपनी दुकान चलाने वाले मुस्लिम नेता और धर्मगुरु इस मामले का राजनीतिकरण कर रहे हैं और करना चाहते हैं। वरना उनकी नेतागिरी और दुकानें बंद हो जायेंगीं! इसके साथ - साथ मैं यह भी साफ़ कर दूं कि यह दिक़्क़त सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के लोग नहीं झेल रहे, बल्कि हिन्दू समुदाय के लोग भी झेल रहे हैं। अगर फैंसला हिंदुओ के पक्ष में नहीं आता, तो हिन्दू धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले नेता और धर्मगुरू भी यही करते।

इन सभी बातों को देखते हुए, फ़िलहाल यह तो साफ़ है कि यह नेता अभी इस मामले को मुद्दा बनाए रखेंगे और अपनी राजनीति की दुकानें चलाते रहेंगे। अगर यह मामला निपट भी जाए तो भी बहुत सारे मामले हैं, जिन्हें मुद्दा बनाकर अभी काफ़ी और दशकों तक हिन्दू - मुसलमान को आपस में लड़वाकर यह लोग अपनी राजनीति कर सकते हैं।

कभी आपने सोचा या फ़िर कभी ज़रा सी देर के लिए भी यह ख़याल आपके दिमाग़ में आया, कि यह सब आख़िर कब और कैसे रुकेगा? कब तक आख़िर यह नेता देश के हिन्दू और मुसलमानों को ऐसे ही लड़वाते रहेंगे?

ईसपर मैं यह कहना चाहता हूं, कि इसमें सबसे बड़ी ग़लती हमारी ख़ुद की है। जिसमें हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी। इन नेताओं के उकसावे में और इनकी बातों में हम ही तो आ जाते हैं। क्यों हैं हम इतने कमज़ोर? क्या हमारे अंदर इतनी भी सोचने और समझने की ताक़त नहीं, कि हक़ीक़त क्या है इन लालची नेताओं और धर्मगुरुओं की? क्या भगवान या हमारे ख़ुदा ने हमारे साथ धोखा किया है, जो सिर्फ़ सोचने के लिए दिमाग़ इन नेताओं और  इन धर्मगुरुओं को दिया है लेक़िन हमें नहीं!?

ऐसा नहीं है, हमारा ईश्वर और हमारा ख़ुदा हमारा दुश्मन नहीं है। उसने हम सबको अक़्ल दी है सोचने के लिए। मगर हमारे दिमाग़ पर दशकों से चलीं आ रहीं हिन्दू - मुस्लिम की बातें इतनी हावी हो चुकी हैं, कि हमने कभी इन बातों से कैसे निकला जाए उस बात को सोचना ही छोड़ दिया है। और यक़ीन मानिए, हमारी यह लापरवाही, यह आदत और यह हरक़त इतनी ख़तरनाक़ और जानलेवा है कि आपको इस बात का अंदाज़ा तब होगा, अगर किसी रोज़ किसी नेता या धर्मगुरु की वज़ह से आपकी जान ख़तरे पड़ेगी। जिस तरह रोज़ देश भर के ग़रीब इनकी राजनीति की भेंट चढ़ते हैं।

यह सभी राजनीति, हमारी बर्बादी और देश की बर्बादी तभी रुकेगी जब हम आपस में लड़ना छोड़ देंगे। आज आप लोग ख़ुद देख सकते हैं, कि अयोध्या पर फैंसला आने से पहले ही पूरे देश के सभी स्कूल बंद करा दिए गए, क्यों? ताक़ि हम लोगों ने जो नफ़रत अपने दिलों में पाल रखी एक दूसरे के लिए, वो कहीं ख़ून ख़राबे ना बदल जाये। क्यों सब डरे हुए थे? इसलिए क्योंकि सब जानते थे, कि सबने एक दूसरे के लिए अच्छा नहीं बुरा सोचा है। इसलिए क्योंकि हिन्दू मुसलमान को और मुसलमान हिन्दू को रोज़ सोशल मीडिया पर उल्टा सीधा बोल रहा है। टीवी चैनलों पर डिबेट्स में एक दूसरे के धर्म पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं। सड़कों पर एक आदमी को घेरकर मार रहा है। और यह सब कौन कर रहा है और किसके उकसावे में? यह सब कर रहा है हिन्दू मुसलमान के साथ और मुसलमान हिन्दू के साथ, सिर्फ़ नेताओं और ढोंगी धर्मगुरुओं के उकसावे में!!

आगर हम इन नेताओं और धर्मगुरुओं के उकसावे ना आएं और एक दूसरे की इज़्ज़त करें और हर लिहाज़ से,  तो यह सब लड़ाई झगड़ा ख़त्म हो जाएगा! नहीं तो अयोधया का यह विवाद यह समझ लीजिए कि ख़त्म  नहीं, यहां से शुरू हुआ है!

Friday, November 8, 2019

"Ayodhya" पर फैंसला क़रीब। रखें इन बातों का ख़याल।

"Ayodhya" पर फैंसला क़रीब। रखें इन बातों का ख़याल। 



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दशकों से चल रहे "Ayodhya विवाद" मामले पर भारत की माननीय उच्च न्यायालय संभवता अब से कुछ दिन उपरांत फैंसला सुना सकती। उम्मीद है, दिनांक 13 से 16 नवंबर 2019 के बीच इसपर फैंसला आ जाए। इसके मद्देनज़र अयोधया में धारा 144 लगा दी गई। इसके साथ ही पूरे उत्तर प्रदेश राज्य में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था भी कर दी गई है। देश के अन्य राज्यों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है, ताक़ि कोई भी देश के माहौल को ख़राब ना कर पाए। 

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, उप्र मुख्यमंत्री योगी  आदित्यनाथ, प्रशासन व सभी धर्म के धर्मगुरुओं ने सभी से शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखने की अपील की है। विशेष रूप से सभी धर्मगुरुओं ने अपने व दूसरे धर्म के लोगों से कहा है, कि फैंसला किसी के भी पक्ष में आये, उसे सबको सम्मानपूर्वक अपनाना है और इस भारत देश की गंगाजमनी तहज़ीब को ऐसे  ही बनाये रखना है। 



रखें इन बातों का ख़याल। 


किसी से भी अयोध्या मामले व फैंसले को लेकर वाद-विवाद ना करें। 

किसी भी "Forwarded" भड़काऊ मेसेज को किसी के भी साथ शेयर करने से बचें अथवा बिल्कुल भी ना करें। (क्योंकि आपको भेजा हुआ Message या न्यूज़ fake भी हो सकती है।) 

ख़बर सही है या ग़लत उसे चेक करने लिए किसी  Official News Websites पर ही भरोसा करें। 

सभी सोशल मीडिया साइट्स और एप्प्स पर प्रशासन द्वारा कड़ी नज़र भी रखी जाएगी, ताक़ि फ़ौरन प्रशासन उसपर करवाई कर सके। 

किसी भी तरह का वीडियो या फ़ोटो सोशल मीडिया पर अपलोड व शेयर ना करें, जो किसी के भी धर्म का अपमान करता हो या फ़िर किसी की भावना को आहत करता हो। 

फैंसला किसी भी पक्ष के हक़ में आये, उसपर कोई भी पक्ष अपनी ख़ुशी का इज़हार इस तरह ना करे, जिससे दूसरे धर्म को ग़लत संदेश जाए। 


(कुल मिलाकर आपको कुछ भी ऐसा नहीं करना है, जिससे वाद विवाद हो।)